हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, मुंबई/11 सितंबर 2026: पाला गली स्थित खोजा शिया इथना अशरी जामा मस्जिद में जुमे की नमाज़ हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन मौलाना सय्यद अहमद अली आबिदी की इमामत में अदा की गई। जुमे के खुतबे में उन्होंने मासूम इमामों की रोशन शिक्षाओं की रोशनी में इंसान की असली कद्र व महत्व, लोगों की सेवा, नेकी को दिखावे से बचाने, अच्छी संगत अपनाने और बच्चों की शिक्षा व तरबीयत की अहमियत पर विस्तार से प्रकाश डाला।
मौलाना सय्यद अहमद अली आबिदी ने इमाम जाफर सादिक अलैहिस्सलाम द्वारा अपने बेटे हज़रत इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम के लिए की गई वसीयत का उल्लेख करते हुए कहा कि मासूम इमामों के कथन प्रकाश हैं और इंसान की हिदायत के लिए बेहतरीन चिराग की तरह हैं। जो व्यक्ति इन शिक्षाओं पर अमल करता है, वह दुनिया और आख़िरत दोनों में कामयाबी हासिल कर सकता है।
उन्होंने इंसान की असली कद्र व कीमत पर बात करते हुए कहा कि केवल खाना, पीना, सोना और औलाद पैदा करना इंसान को जानवरों से अलग नहीं करता, क्योंकि ये सभी काम जानवर भी करते हैं। इंसान की असली पहचान उसकी सोच, आदतों, अच्छे व्यवहार, चरित्र और दूसरों के साथ उसके संबंधों से होती है। अगर कोई व्यक्ति अपने पड़ोसी की भूख, उसके बच्चों की शिक्षा या उसकी जरूरतों से अनजान रहे तो उसे अपने इंसानी चरित्र के बारे में सोचना चाहिए।
मौलाना सय्यद अहमद अली आबिदी ने लोगों की सेवा की अहमियत बताते हुए कहा कि किसी गरीब की मदद करना, किसी बीमार का इलाज कराना, किसी जरूरतमंद परिवार का घर चलाने में मदद करना या किसी बच्चे की शिक्षा की फीस देना बड़ी नेकी है। लेकिन नेकी करने के साथ उसे सुरक्षित रखना भी जरूरी है।
उन्होंने कहा कि नेकी करना आसान है, लेकिन नेकी को सुरक्षित रखना मुश्किल है। अगर कोई व्यक्ति किसी जरूरतमंद की चुपचाप मदद करे और बाद में लोगों के सामने उसका जिक्र करके उस पर एहसान जताए तो उसकी नेकी का सवाब प्रभावित हो सकता है। उन्होंने समझाने के लिए उदाहरण दिया कि अगर कीमती घी से भरे बर्तन में छोटा-सा छेद हो जाए तो धीरे-धीरे पूरा घी निकल जाता है। इसी तरह दिखावा, एहसान जताने और अपनी नेकियों का बार-बार जिक्र करने से इंसान के नेक कामों का जमा किया हुआ सवाब खत्म हो सकता है।
उन्होंने आगे कहा कि इंसान को नेक काम इस तरह करने चाहिए कि जहां तक संभव हो, उनमें दिखावा न हो। अगर किसी की मदद करने के बाद वह व्यक्ति सलाम या सम्मान न भी करे, तब भी अपने एहसान का जिक्र नहीं करना चाहिए, क्योंकि नेकी का उद्देश्य अल्लाह की रज़ा हासिल करना है, लोगों से तारीफ या बदला पाना नहीं।
जुमे के खुतबे में अच्छी संगत की अहमियत पर भी जोर दिया गया। मौलाना सैयद अहमद अली आबिदी ने कहा कि इंसान को नेक और अच्छे लोगों की संगत अपनानी चाहिए, क्योंकि संगत का इंसान के चरित्र और आदतों पर गहरा असर पड़ता है। किसी व्यक्ति की शख्सियत को समझने के लिए उसके दोस्तों और करीबी साथियों को भी देखना चाहिए।
उन्होंने खुशामद और झूठी तारीफ से सावधान करते हुए कहा कि इंसान को ऐसे लोगों को अपने आसपास जमा नहीं करना चाहिए जो उसकी हर बात की तारीफ करें। बल्कि उसे ऐसे ईमानदार लोगों की जरूरत है जो उसकी गलती को गलती और अच्छाई को अच्छाई बताएं। सच्ची और ईमानदार आलोचना इंसान की सुधार और व्यक्तित्व निर्माण का साधन बनती है।
मौलाना सैयद अहमद अली आबिदी ने आलोचना की अहमियत बताते हुए हीरे, कीमती पत्थर और चांदी का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि जिस तरह हीरे को तराशने और चांदी को आग और हथौड़े के दौर से गुजारने के बाद उसकी कीमत बढ़ती है, उसी तरह ईमानदार आलोचना और सुधार की सलाह इंसान के व्यक्तित्व को निखारती है और उसके मक़ाम को ऊंचा करती है। इसलिए अच्छी और ईमानदार आलोचना से नाराज होने के बजाय उसे अपनी सुधार का माध्यम समझना चाहिए।
खुतबे के दूसरे हिस्से में मौलाना सय्यद अहमद अली आबिदी ने बच्चों की शिक्षा व तरबीयत और धार्मिक केंद्रों के प्रभावी इस्तेमाल पर विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा कि आज के दौर में बहुत से परिवार छोटे घरों में रहते हैं, जहां बच्चों के लिए उचित शैक्षणिक वातावरण उपलब्ध नहीं होता। इसलिए मस्जिदों, इमामबारगाहों और दूसरे धार्मिक केंद्रों को केवल खास दिनों की मजलिसों तक सीमित रखने के बजाय पूरे साल शैक्षणिक और तरबीयती गतिविधियों के लिए इस्तेमाल किया जाना चाहिए।
उन्होंने सुझाव दिया कि इन धार्मिक केंद्रों में बच्चों और बच्चियों की शिक्षा के लिए उचित समय तय किया जाए और इलाके के शिक्षित लोग बच्चों की शिक्षा, तरबीयत और निगरानी में अपनी भूमिका निभाएं। उन्होंने कहा कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की अज़ादारी निश्चित रूप से सवाब का काम है, लेकिन अज़ादारों के बच्चों की शिक्षा, तरबीयत और उनके उज्ज्वल भविष्य के लिए प्रयास करना भी बड़ी सेवा है।
मौलाना सय्यद अहमद अली आबिदी ने बुजुर्गों और इलाके के लोगों से अपील की कि वे बेवजह चाय की दुकानों या दूसरी जगहों पर बैठकर विश्व राजनीति पर लंबे समय तक चर्चा करने में अपना समय बर्बाद करने के बजाय अपनी कौम और नई पीढ़ी के भविष्य के लिए समय निकालें। उन्होंने कहा कि हर व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार बच्चों की शिक्षा में योगदान दे सकता है। कोई शिक्षा दे सकता है, कोई आर्थिक साधन उपलब्ध करा सकता है, कोई शैक्षणिक केंद्रों की देखभाल कर सकता है और कोई केवल प्रोत्साहित करके भी इस नेक काम में शामिल हो सकता है।
उन्होंने कहा कि “माशाअल्लाह”, “बारकल्लाह”, “जज़ाकल्लाह” या “अल्लाह आपको सलामत रखे” जैसे प्रोत्साहन के शब्द भी शिक्षा और तरबीयत के क्षेत्र में काम करने वालों का हौसला बढ़ा सकते हैं।
मौलाना सैयद अहमद अली आबिदी ने अंत में इस संकल्प पर जोर दिया कि सामूहिक प्रयासों के माध्यम से ऐसे शिक्षित, अच्छे चरित्र वाले, योग्य और धार्मिक जागरूकता रखने वाले युवा तैयार किए जाएं, जो भविष्य में अपनी कौम, समाज और मक्तब की प्रभावी सेवा कर सकें। उन्होंने लोगों से अपील की कि वे अपना समय, क्षमता और संसाधन नई पीढ़ी की शिक्षा व तरबीयत और कौम के उज्ज्वल भविष्य के लिए खर्च करें।
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